Sunday, August 21, 2011

इतिहास

हो गया प्रारंभ आन्दोलन जन का
धन्यवाद तुम्हे ए परमपिता,
हम साक्षी रहे इस क्षण का
जो बन रहा इतिहास जन का ।

Tuesday, August 16, 2011

एक बूढा आदमी

देश के लिए चला है
एक बूढा आदमी
सबको ले चला है
एक बूढा आदमी
उम्र ७४ कद है छोटा
पर सौ करोड़ पर
भारी है
एक बूढा आदमी
देश को तन देश को मन
सर्वस्व कर चला है
एक बूढा आदमी
लड़ने चला है
लड़ाई कठिन है
मर मिटने चला है
राह कठिन है
पर हौसला ये लिए चला है
एक बूढा आदमी
"हम जीतेंगे प्रण समर ये हमारा "
सबसे ये कहते चला है
वो बूढा आदमी।







Tuesday, July 26, 2011

चेतावनी

नहीं है स्वार्थ कि सिर्फ जन्म लिया ही
ज़मीन पर
हम उनका भी आभार जताया करते हैं ।
भूमि नहीं अपितु
संसार है ये जो कर्म का
इसमें भी अपनी
आवाज़ सुनाया करते हैं ।
है खबरदार ! मुझे
अगर जो मैंने
आँखें मूँद ली उस पक्षी कि भांति
इसमें आपत्ति जताया करते हैं।
नहीं तठस्थ रही वृत्ति हमारी
कर्म में 'सर्व-हित' को बुलंद बनाया करते हैं।

Thursday, July 21, 2011

प्रश्न

एक बार की बात है
एक आदमी चाणक्य के पास आया
और कहा,
गुरुदेव, कहीं किसी से
मैंने आपके बारे में कुछ सुना है
में आश्वश्त नहीं
पर कुछ सुना है ।
मैं आपको वो बताना चाहता हूँ
जो सुना है वो सुनना चाहता हूँ ।
चाणक्य ने कहा -
रुको बंधु,
पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो ,
फिर बताना
जो मेरे बारे में सुना है वो सुनाना ।
पहले ये बताओ की तुमने जो भी सुना है
क्या वो सच है ?
उसने कहा
" मैंने तो बस सुना है तो इसकी प्रामाणिकता नहीं है
तो कह नहीं सकता सच या झूठ "।
चाणक्य ने पुन: पुछा -
जो तुमने सुना है
उससे मुझे क्या प्रसन्नत्ता होगी ?
उसने कहा
गुरुदेव उस बात में आपकी प्रशंसा नहीं
अतः आपको खुशी नहीं अपितु
दुःख होगा ।
चाणक्य ने आखिरी प्रश्न किया,
जो बात तुम मुझे बताना चाहते हो
उसमे मेरा हित है या अहित?
उसने कहा-
गुरुदेव जिस बात से आपको दुःख होगा ,
जिसमे तकलीफ छिपी है
वो हितकारी कैसे हो सकती है ?
उस बात में आपका हित कतई नहीं है।
अंततः चाणक्य ने कहा -
हे सज्जन , जिस बात की प्रमाणिकता नहीं
जिससे मुझे प्रसन्नता नहीं
और
जिस बात में मेरा हित नहीं
ऐसी बात को सुनने का क्या प्रयोजन ?

Friday, July 1, 2011

अनवरत राही नहीं चलता

मत पूछ
किधर जायेंगे,
थक गए हैं
अपने घर जायेंगे ।

Thursday, June 2, 2011

भय

बहुत ऊंचे है यूकलिप्टस ताड़
आसमान और बादलों के पास
उनके करीब ,
पूरे गर्व साथ
ऊंचे , बहुत ऊंचे ...
घास भी इसी ज़मीन पर पनपती है
जहाँ से
यूकलिप्टस और ताड़
को ऊँचाइयाँ मिलती हैं
ये पेड़ कहते हैं-
"हे तुच्छ घास की प्रजाति-
ज़रा ऊपर देख हमे
हम कितने ऊंचे और तू इतनी नीची
तू कभी उठ नहीं सकती। "
घास कुछ नहीं कहती बस सोचती है...
अगर कभी तूफ़ान आता है तो
मैं इस धरती में सिमट जाती हूँ
और सुरक्षित हो रहती हूँ...
हमेशा

Tuesday, February 16, 2010

कर्त्तव्य

एक घर में आग लग गई
घर धू धू कर जलने लगा ।
घर वाले परेशान हो कर इधर उधर भागने लगे
आग बुझाने की हर संभव कोशिश करने लगे ।
उसी घर में एक चिड़िया भी रहती थी ,
आग में उसका घोसला भी जल गया
चिड़िया इससे बहुत दुखी हुई
सब कुछ जलता देख बहुत रोई ।
घर जलता देखा चिड़िया ने भी अपनी चोंच
में पानी भरा और आग बुझाने उडी ।
ये देख एक आदमी ने कहा -
" रे चिड़िया ये तू क्या करती है
एक चोंच पानी से किसका दम भारती है ।"
चिड़िया ने कहा -"हे मनुष्य , इतिहास में जब भी इस घटना को दोहराया जायेगा
आग लगाने वालों में मेरा नाम कभी नहीं आएगा ।"