नहीं है स्वार्थ कि सिर्फ जन्म लिया ही
ज़मीन पर
हम उनका भी आभार जताया करते हैं ।
भूमि नहीं अपितु
संसार है ये जो कर्म का
इसमें भी अपनी
आवाज़ सुनाया करते हैं ।
है खबरदार ! मुझे
अगर जो मैंने
आँखें मूँद ली उस पक्षी कि भांति
इसमें आपत्ति जताया करते हैं।
नहीं तठस्थ रही वृत्ति हमारी
कर्म में 'सर्व-हित' को बुलंद बनाया करते हैं।
Tuesday, July 26, 2011
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