हो गया प्रारंभ आन्दोलन जन का
धन्यवाद तुम्हे ए परमपिता,
हम साक्षी रहे इस क्षण का
जो बन रहा इतिहास जन का ।
Sunday, August 21, 2011
Tuesday, August 16, 2011
एक बूढा आदमी
देश के लिए चला है
एक बूढा आदमी
सबको ले चला है
एक बूढा आदमी
उम्र ७४ कद है छोटा
पर सौ करोड़ पर
भारी है
एक बूढा आदमी
देश को तन देश को मन
सर्वस्व कर चला है
एक बूढा आदमी
लड़ने चला है
लड़ाई कठिन है
मर मिटने चला है
राह कठिन है
पर हौसला ये लिए चला है
एक बूढा आदमी
"हम जीतेंगे प्रण समर ये हमारा "
सबसे ये कहते चला है
वो बूढा आदमी।
एक बूढा आदमी
सबको ले चला है
एक बूढा आदमी
उम्र ७४ कद है छोटा
पर सौ करोड़ पर
भारी है
एक बूढा आदमी
देश को तन देश को मन
सर्वस्व कर चला है
एक बूढा आदमी
लड़ने चला है
लड़ाई कठिन है
मर मिटने चला है
राह कठिन है
पर हौसला ये लिए चला है
एक बूढा आदमी
"हम जीतेंगे प्रण समर ये हमारा "
सबसे ये कहते चला है
वो बूढा आदमी।
Tuesday, July 26, 2011
चेतावनी
नहीं है स्वार्थ कि सिर्फ जन्म लिया ही
ज़मीन पर
हम उनका भी आभार जताया करते हैं ।
भूमि नहीं अपितु
संसार है ये जो कर्म का
इसमें भी अपनी
आवाज़ सुनाया करते हैं ।
है खबरदार ! मुझे
अगर जो मैंने
आँखें मूँद ली उस पक्षी कि भांति
इसमें आपत्ति जताया करते हैं।
नहीं तठस्थ रही वृत्ति हमारी
कर्म में 'सर्व-हित' को बुलंद बनाया करते हैं।
ज़मीन पर
हम उनका भी आभार जताया करते हैं ।
भूमि नहीं अपितु
संसार है ये जो कर्म का
इसमें भी अपनी
आवाज़ सुनाया करते हैं ।
है खबरदार ! मुझे
अगर जो मैंने
आँखें मूँद ली उस पक्षी कि भांति
इसमें आपत्ति जताया करते हैं।
नहीं तठस्थ रही वृत्ति हमारी
कर्म में 'सर्व-हित' को बुलंद बनाया करते हैं।
Thursday, July 21, 2011
प्रश्न
एक बार की बात है
एक आदमी चाणक्य के पास आया
और कहा,
गुरुदेव, कहीं किसी से
मैंने आपके बारे में कुछ सुना है
में आश्वश्त नहीं
पर कुछ सुना है ।
मैं आपको वो बताना चाहता हूँ
जो सुना है वो सुनना चाहता हूँ ।
चाणक्य ने कहा -
रुको बंधु,
पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो ,
फिर बताना
जो मेरे बारे में सुना है वो सुनाना ।
पहले ये बताओ की तुमने जो भी सुना है
क्या वो सच है ?
उसने कहा
" मैंने तो बस सुना है तो इसकी प्रामाणिकता नहीं है
तो कह नहीं सकता सच या झूठ "।
चाणक्य ने पुन: पुछा -
जो तुमने सुना है
उससे मुझे क्या प्रसन्नत्ता होगी ?
उसने कहा
गुरुदेव उस बात में आपकी प्रशंसा नहीं
अतः आपको खुशी नहीं अपितु
दुःख होगा ।
चाणक्य ने आखिरी प्रश्न किया,
जो बात तुम मुझे बताना चाहते हो
उसमे मेरा हित है या अहित?
उसने कहा-
गुरुदेव जिस बात से आपको दुःख होगा ,
जिसमे तकलीफ छिपी है
वो हितकारी कैसे हो सकती है ?
उस बात में आपका हित कतई नहीं है।
अंततः चाणक्य ने कहा -
हे सज्जन , जिस बात की प्रमाणिकता नहीं
जिससे मुझे प्रसन्नता नहीं
और
जिस बात में मेरा हित नहीं
ऐसी बात को सुनने का क्या प्रयोजन ?
एक आदमी चाणक्य के पास आया
और कहा,
गुरुदेव, कहीं किसी से
मैंने आपके बारे में कुछ सुना है
में आश्वश्त नहीं
पर कुछ सुना है ।
मैं आपको वो बताना चाहता हूँ
जो सुना है वो सुनना चाहता हूँ ।
चाणक्य ने कहा -
रुको बंधु,
पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो ,
फिर बताना
जो मेरे बारे में सुना है वो सुनाना ।
पहले ये बताओ की तुमने जो भी सुना है
क्या वो सच है ?
उसने कहा
" मैंने तो बस सुना है तो इसकी प्रामाणिकता नहीं है
तो कह नहीं सकता सच या झूठ "।
चाणक्य ने पुन: पुछा -
जो तुमने सुना है
उससे मुझे क्या प्रसन्नत्ता होगी ?
उसने कहा
गुरुदेव उस बात में आपकी प्रशंसा नहीं
अतः आपको खुशी नहीं अपितु
दुःख होगा ।
चाणक्य ने आखिरी प्रश्न किया,
जो बात तुम मुझे बताना चाहते हो
उसमे मेरा हित है या अहित?
उसने कहा-
गुरुदेव जिस बात से आपको दुःख होगा ,
जिसमे तकलीफ छिपी है
वो हितकारी कैसे हो सकती है ?
उस बात में आपका हित कतई नहीं है।
अंततः चाणक्य ने कहा -
हे सज्जन , जिस बात की प्रमाणिकता नहीं
जिससे मुझे प्रसन्नता नहीं
और
जिस बात में मेरा हित नहीं
ऐसी बात को सुनने का क्या प्रयोजन ?
Friday, July 1, 2011
Thursday, June 2, 2011
भय
बहुत ऊंचे है यूकलिप्टस ताड़
आसमान और बादलों के पास
उनके करीब ,
पूरे गर्व क साथ
ऊंचे , बहुत ऊंचे ...
घास भी इसी ज़मीन पर पनपती है
जहाँ से यूकलिप्टस और ताड़
को ऊँचाइयाँ मिलती हैं ।
ये पेड़ कहते हैं-
"हे तुच्छ घास की प्रजाति-
ज़रा ऊपर देख हमे
हम कितने ऊंचे और तू इतनी नीची।
तू कभी उठ नहीं सकती। "
घास कुछ नहीं कहती बस सोचती है...
अगर कभी तूफ़ान आता है तो
मैं इस धरती में सिमट जाती हूँ
और सुरक्षित हो रहती हूँ...
हमेशा।
आसमान और बादलों के पास
उनके करीब ,
पूरे गर्व क साथ
ऊंचे , बहुत ऊंचे ...
घास भी इसी ज़मीन पर पनपती है
जहाँ से यूकलिप्टस और ताड़
को ऊँचाइयाँ मिलती हैं ।
ये पेड़ कहते हैं-
"हे तुच्छ घास की प्रजाति-
ज़रा ऊपर देख हमे
हम कितने ऊंचे और तू इतनी नीची।
तू कभी उठ नहीं सकती। "
घास कुछ नहीं कहती बस सोचती है...
अगर कभी तूफ़ान आता है तो
मैं इस धरती में सिमट जाती हूँ
और सुरक्षित हो रहती हूँ...
हमेशा।
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