नहीं है स्वार्थ कि सिर्फ जन्म लिया ही
ज़मीन पर
हम उनका भी आभार जताया करते हैं ।
भूमि नहीं अपितु
संसार है ये जो कर्म का
इसमें भी अपनी
आवाज़ सुनाया करते हैं ।
है खबरदार ! मुझे
अगर जो मैंने
आँखें मूँद ली उस पक्षी कि भांति
इसमें आपत्ति जताया करते हैं।
नहीं तठस्थ रही वृत्ति हमारी
कर्म में 'सर्व-हित' को बुलंद बनाया करते हैं।
Tuesday, July 26, 2011
Thursday, July 21, 2011
प्रश्न
एक बार की बात है
एक आदमी चाणक्य के पास आया
और कहा,
गुरुदेव, कहीं किसी से
मैंने आपके बारे में कुछ सुना है
में आश्वश्त नहीं
पर कुछ सुना है ।
मैं आपको वो बताना चाहता हूँ
जो सुना है वो सुनना चाहता हूँ ।
चाणक्य ने कहा -
रुको बंधु,
पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो ,
फिर बताना
जो मेरे बारे में सुना है वो सुनाना ।
पहले ये बताओ की तुमने जो भी सुना है
क्या वो सच है ?
उसने कहा
" मैंने तो बस सुना है तो इसकी प्रामाणिकता नहीं है
तो कह नहीं सकता सच या झूठ "।
चाणक्य ने पुन: पुछा -
जो तुमने सुना है
उससे मुझे क्या प्रसन्नत्ता होगी ?
उसने कहा
गुरुदेव उस बात में आपकी प्रशंसा नहीं
अतः आपको खुशी नहीं अपितु
दुःख होगा ।
चाणक्य ने आखिरी प्रश्न किया,
जो बात तुम मुझे बताना चाहते हो
उसमे मेरा हित है या अहित?
उसने कहा-
गुरुदेव जिस बात से आपको दुःख होगा ,
जिसमे तकलीफ छिपी है
वो हितकारी कैसे हो सकती है ?
उस बात में आपका हित कतई नहीं है।
अंततः चाणक्य ने कहा -
हे सज्जन , जिस बात की प्रमाणिकता नहीं
जिससे मुझे प्रसन्नता नहीं
और
जिस बात में मेरा हित नहीं
ऐसी बात को सुनने का क्या प्रयोजन ?
एक आदमी चाणक्य के पास आया
और कहा,
गुरुदेव, कहीं किसी से
मैंने आपके बारे में कुछ सुना है
में आश्वश्त नहीं
पर कुछ सुना है ।
मैं आपको वो बताना चाहता हूँ
जो सुना है वो सुनना चाहता हूँ ।
चाणक्य ने कहा -
रुको बंधु,
पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो ,
फिर बताना
जो मेरे बारे में सुना है वो सुनाना ।
पहले ये बताओ की तुमने जो भी सुना है
क्या वो सच है ?
उसने कहा
" मैंने तो बस सुना है तो इसकी प्रामाणिकता नहीं है
तो कह नहीं सकता सच या झूठ "।
चाणक्य ने पुन: पुछा -
जो तुमने सुना है
उससे मुझे क्या प्रसन्नत्ता होगी ?
उसने कहा
गुरुदेव उस बात में आपकी प्रशंसा नहीं
अतः आपको खुशी नहीं अपितु
दुःख होगा ।
चाणक्य ने आखिरी प्रश्न किया,
जो बात तुम मुझे बताना चाहते हो
उसमे मेरा हित है या अहित?
उसने कहा-
गुरुदेव जिस बात से आपको दुःख होगा ,
जिसमे तकलीफ छिपी है
वो हितकारी कैसे हो सकती है ?
उस बात में आपका हित कतई नहीं है।
अंततः चाणक्य ने कहा -
हे सज्जन , जिस बात की प्रमाणिकता नहीं
जिससे मुझे प्रसन्नता नहीं
और
जिस बात में मेरा हित नहीं
ऐसी बात को सुनने का क्या प्रयोजन ?
Friday, July 1, 2011
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